राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की विवादित किताब के खिलाफ याचिका खारिज

नई दिल्ली: राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की किताब ‘टर्बुलेंट इयर्स 1980-1996 के खिलाफ दाखिल की गई याचिका को बुधवार को अदालत ने खारिज कर दिया। पटियाला हाउस कोर्ट में दायर दीवानी मुकदमे में राष्ट्रपति पर आरोप लगाया गया था कि उन्‍होंने अपनी किताब में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को गलत तरीके से पेश किया। किताब में लिखा गया है कि इस घटना से पूरा देश शर्मसार हुआ था, जबकि याची का कहना था कि यह उनके निजी विचार हो सकते हैं। इस घटना से न तो वह शर्मसार हुए और न ही उनके जैसे लाखों करोड़ो लोग इस घटना से शर्मसार हुए है।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश विनीता गोयल द्वारा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को बतौर आरोपी बुलाए जाने की याचिका को खारिज करने के बाद शिकायतकर्ता ने कहा कि वह इसके विरोध में दिल्‍ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। याची के ककील हरि शंकर जैन व विष्णु शंकर जैन ने कहा कि उनके द्वारा उठाया गया मुददा एक दम सही है। उन्‍हें विश्‍वास है कि हाई कोर्ट से उन्‍हें जरूर राहत मिलेगी।

वहीं, महामहीम का पक्ष रखने वाली वरिष्‍ठ वकील रूबी गौतम ने इस फैसले से खुशी जाहिर की। उन्‍होंने कहा कि राष्ट्रपति को प्रथम नागरिक का दर्जा दिया गया है। वह संविधान से उपर हैं। न्‍यायपालिका राष्ट्रपति के संचालन में ही स्‍वतंत्र रूप से काम कर पा रही हैं। अगर स्‍वयं अदालत ही महामहीम को बतौर आरोपी बुलाने लगी तो फिर देश का पूरा ढ़ाचा ही बिगड़ जाएगा।

रूबी गौतम ने कहा कि अभी आदेश की कॉपी उन्‍हें नहीं मिल पाई है, लेकिन यह साफ है कि अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 361 (4) की समीक्षा करने के बाद यह पाया होगा कि राष्ट्रपति को बतौर आरोपी बुनाए जाने का उनके पास अधिकार ही नहीं है।

बचाव पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 361 (4) पर कहा था कि महामहीम राष्ट्रपति व विभिन्‍न राज्‍यों के राज्यपाल को मुकदमे से छूट मिली हुई है, लेकिन अगर राष्ट्रपति कोई काम अपनी निजी हैसियत में करते हैं तो उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। राष्ट्रपति के खिलाफ याचिका लगाने से पूर्व  दो माह पहले लिखित नोटिस राष्ट्रपति को देना अनिवार्य है। यह नोटिस 4 जुलाई को ही महामहीम को दिया जा चुका है, लेकिन नोटिस का जवाब प्राप्त नहीं हुआ।

याचिका में कहा गया था कि राष्ट्रपति ने अपनी किताब में लिखा है कि बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का फैसला गलत था। सच यह है कि बाबरी मस्जिद के गेट फैजाबाद जिला अदालत के आदेश पर खोले गए थे। राष्ट्रपति ने राजीव गांधी के इशारे पर मस्जिद खुलवाने की बात कहकर न्‍यायिक तंत्र का मजाक उड़ाया है। देश की जिला अदालतें स्‍वतंत्र रूप से काम कर रही हैं। बाबरी मस्जिद के गेट खोलने का आदेश फैजाबाद जिला अदालत ने अपने विवेक से दिया था। इसमें राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं है।

 

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