अदालत ने पूछा, आखिर बिना कोई वजह के क्यों नहीं लौटाई गई ठेकेदारों की पेमेंट

नई दिल्ली:  तीस हजारी अदालत ने उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) द्वारा काम के एवज में ठेकेदारों को उनका बकाया नहीं लौटाने पर सख्त रुख अख्तियार किया है। दो अलग-अलग मामलों में सुनवाई करते हुए अदालत ने पीडि़त ठेकेदारों को ब्याज सहित उनका बकाया लौटाने के निर्देश दिए हैं।
अतिरिक्त जिला जज गुरविंदर पाल सिंह ने अपने आदेश में कहा कि निगम की तरफ से ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह पता चल सके कि पहले लाइन में मौजूद अन्य लोगों का बकाया चुकाए जाने के बाद उक्त ठेकेदारों का रुपया लौटाया जाएगा। ऐसा भी कोई दस्तावेज निगम की तरफ से पेश नहीं किया गया जिससे यह पता चले कि निगम के पास रुपयों की कमी है। निगम ने ठेकेदारों का बकाया होने की बात स्वयं कबूल की है। ऐसे में उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि पीडि़त ठेकेदारों को रुपये देने का इंतजाम ठेके से पहले या उसके बाद किया जाए। निगम की आंतरिक गतिविधियों और रुपये का इंतजाम करने के तरीकों से याचिकाकर्ताओं का कोई लेना देना नहीं है।
अदालत ने ठेकेदार विरेंद्रजीत सिंह को बकाया 49,900 रुपये की सिक्योरिटी राशि व 4,69,202 रुपये की कुल रकम पर 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का आदेश दिया। इसी तरह हरप्रीत सिंह नामक ठेकेदार को 42,252 रुपये की सिक्योरिटी राशि के साथ-साथ 3,92,389 रुपये की कुल राशि पर 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा। दोनों मामलों में याची द्वारा भेजे गए लीगल नोटिस की सीमा 18 मार्च 2015 को खत्म हुई थी। इसी तारीख से जबतक रकम नहीं लाटाई जाएगी निगम को याचिकाकर्ताओं को ब्याज देना होगा।
अदालत में रिकवरी के लिए लगाए गए सूट में दोनों ठेकेदारों ने कहा था कि उन्हें सितंबर 2013 में नारायणा गांव और इंद्रपुरी इलाके में नालों का निर्माण व उनकी मरम्मत आदि के अलग-अलग ठेके दिए गए थे। काम करने से पूर्व उनसे पहले ही सिक्योरिटी राशि जमा करवा ली गई। काम करने के बाद मूल राशि में से सिक्योरिटी की राशि काटकर उन्हें बाकी की रकम लौटा दी गई थी। दो साल तक अधिकारी निगम के दफ्तर के चक्कर कटवाते रहे, लेकिन उनका रुपया नहीं लौटाया गया। इसक पीछे कोई कारण भी उन्हें नहीं बताया गया था। अंतत: अपना रुपया वापस पाने के लिए ठेकेदारों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

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