जानिए, अमेरिकी सेना की नाकामियों की कहानियां…

नई दिल्ली : दुनिया की अगुवाई करने का दावा करने वाला अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे शक्तिशाली मुल्क होने का दावा करता है। अमेरिका ने अपनी सेना के बलबूते ही अल कायदा प्रमुख और दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन से लेकर इराक के तानाशाह राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को भी सत्ता से उखाड़ फेंका, लेकिन क्या आपको पता है कि अमेरिका की यह विजय गाथा उन देशों के लिए किस प्रकार आतंकवाद के बीज बाेने व अराजकता की स्थिति पैदा होने का सबब बनी।

आइए, हम बताते हैं कि कैसे वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान, इराक व पाकिस्तान जैसे देशों में आतंकवाद के तेजी से पनपने में अमेरिकी सेनाओं ने अहम भूमिका निभाई।

 अमेरिका की गलतियों से हुआ अलकायदा, तालिबान का जन्म

अमेरिकी कार्रवाई में मारे गए अलकायदा के पूर्व प्रमुख ओसामा बिन लादेन
अमेरिकी कार्रवाई में मारे गए अलकायदा के पूर्व प्रमुख ओसामा बिन लादेन

अफगानिस्तान की धरती पर सत्ता में काबिज कम्यूनिस्ट पार्टी को सत्ता के उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाया। वर्ष 1979 से वर्ष 1989 के बीच दोनों देशों ने मिलकर अफगानिस्तानी सत्ता के विरोध उठ रहे स्वरों को हवा दी। इतना ही नहीं विरोधियों को हथियार भी बांटे गए। इसका नतीजा यह हुआ कि बाद में इन बागियों ने तालिबान का गठन कर लिया। तालिबान का नया स्वरूप अमेरिका और पाकिस्तान के सामने बाद में आतंकवाद और दहशतगर्दी के रूप में सामने आया। आज पाकिस्तान में बढ़ते आतंकवाद के लिए खुद पाकिस्तान ही जिम्‍मेदार है।

हमले का बदला लेने के लिए अफगानिस्तान को किया तबाह

वर्ष 2001 में 11 सितंबर को अमेरिका में पेंटागन पर हमला हुआ। यह पहली बार था जब अमेरिका को अपने ही उपजाए आतंकवाद का सामना करना पड़ा। बदले की कार्रवाई करते हुए अमेरिकी सेना ने अलकायदा को मिटाने के लिए अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजी। जड़ से अलकायदा को निपटाने के चक्कर में अमेरिका ने अफगानिस्तान की आम जनता को ही हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अफगानिस्तान में अलकायदा और तालिबान जैसे संगठन और मजबूत हो गए। लगातार मरते सैनिकों और धरातल पर जटिल होती स्थिति को देखते हुए वर्ष 2014 में आखिर अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान छोडऩा पड़ा। हालांकि अमेरिका आज भी यह मानना है कि अफगानिस्तान से उनकी कार्रवाई सफल ऑपरेशन था।

अमेरिकी सेनाओं के पीछे हटते ही उत्तरी और दक्षिण वियतनाम फिर हुए एक

वर्ष 1954 में उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच जंग छिड़ गई। north-south-vietnamआग में घी डालने के लिए अमेरिका भी इसमें कूद गया। उसने दक्षिण वियतनाम का साथ निभाते हुए उत्तरी वियतनाम पर हमला कर दिया। यह लड़ाई 21 साल तक चली। वर्ष 1975 तक इस खूनी खेल के दौरान कुल 58 हजार अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई जबकि दोनों देशों के मिलाकर करीब 30 हजार लोगों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। दक्षिण वियतनाम से ही यह आवाज उठने लगी कि अमेरिकी सेना को देश छोडऩे के लिए कहा जाए। भारी दबाव के बाद वर्ष 1975 में अमेरिकी सेनाओं को वियतनाम की धरती छोडऩी पड़ी। इसके महज दो साल के भीतर एक दूसरे के खून के प्यासे यह दोनों देश एक बार फिर एक हो गए।

रसायनिक हथियार खत्म करने के नाम पर सद्दाम शासन का किया अंत

इराक के पूर्व राष्‍ट्रपति सददाम हुसैन
इराक के पूर्व राष्‍ट्रपति सददाम हुसैन

वर्ष 2003 में जब अमेरिका ने इराक के तानाशाह शासक सद्दाम हुसैन की सत्ता का अंत करने के लिए युद्ध किया तो इसे रसायनिक हथियारों का अंत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया। दरअसल, अमेरिका का मानना था कि सद्दाम हुसैन अंदर ही अंदर अपने देश में रसायनिक हथियार बना रहा है। इस दौरान कुछ यूरोप के देशों ने अमेरिका को ऐसा नहीं करने के लिए अगाह भी किया। अमेरिका ने किसी की नहीं सुनी। मानवाधिकार का उल्लंघन करते हुए अमेरिका ने हजारों इराकियों को मौत के घाट उतार दिया। अमेरिका सद्दाम हुसैन का नामो निशान मिटा कर इराक से चला तो गया। आज इराक में सक्रिय इस्लामिक स्टेट नामक आतंकी संगठन के उपजने का कारण भी अमेरिकी सेना ही है।

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